सोमवार, 22 नवंबर 2021

खण्डेला का इतिहास भाग-9

लाडखानी शेखावत और उनका धैर्य




गतांक से आगे-
राजा रायसल के 12 पुत्र थे जिनमें 7 का वंश आगे बढ़ा बाकी के कोई औलाद नही थी। जिनमें लाल सिंह, ताज सिंह, तिरमाल, भोजराज, परसराम, गिरधर, हरिराम जी।
रायसल जी के बाद गिरधर जी को खण्डेला का राजा बनाया गया तथा बाकी भाइयों को जागीरे दी गयी।
लालसिंह (लाडखानी)-घाटवा से लामयां तक की पट्टी।
तिरमल जी-नागौर -कासली पट्टी
भोजराज-उदयपुर
गिरधर-खण्डेला
परसराम-12 गाँवो के साथ बाय का ठिकाना
तेजसिंह-डीडवाना और झाड़ोद पट्टी के गाँव
हरिराम-मूंडरू के साथ अन्य पड़ोसी गाँव।

1.लाडखानी- रायसल जी के ज्येष्ठ पुत्र थे। बादशाह उन्हें लाडखान कहकर पुकारता था तो उनका नाम लाडखान पड़ गया फिर आगे जाकर लाडखानी शेखावत कहलाये।

युवावस्था में पहुचते ही लाडखान जी हुजूरी सेवको और साथियों की कुसंगति में भांग, अफीम, गांजा के सेवन में पड़ गए।नशे ने उन्हें आलसी बना दिया परिणामतः वो कुशल राजा न बन सके।कभी खण्डेला तो कभी रैवासा रहते हुए उन्होंने अपना आराम का समय व्यतीत किया।खण्डेला की बहियों से पता चलता है कि लाडखान बहुत ही धैर्य शील और धर्मवान व्यक्ति थे। साधु महात्माओ की सेवा की तरफ अधिक रुझान था। अपने समय के प्रसिद्ध सन्त दादू दयाल के भक्त थे।

लाडा फौजां लाडखान सिरदार सहट्टा।
कल्हण दे कल्याण दे भगी पांव ओहहट्टा।।

इससे सिद्ध होता है कि लाडखान और उनके पुत्र कल्याणदास बहुत ही वीर थे और अग्रिम पंक्ति में युद्ध करते थे। धोळी के सीमा युद्ध मे वो मानसिंह के खिलाफ लड़े थे। लाडखान जिस चीज के लिए प्रसिद्ध थे वह है उनका धैर्य और सहनशीलता व भाइयों के प्रति प्रेम।
एक किस्सा है उनके धैर्य का -
एक बार खण्डेला में भयंकर अकाल पड़ा ,जनता अन्न के दाने -दाने को तरस गयी। तब राजा रायसल जी थे लेकिन शासन प्रभार तब भोजराज जी देखा करते थे। तब रायसल जी सहमति से भोजराज ने जनता की सहायता हेतु अकाल राहत योजना के तहत एक तालाब खुदवाना शुरू किया जिसमें मजदूरों को भगर(अन्न) दिया जाता था। तब रोज बैलगाड़ियों पर अन्न के बोरे लादकर होद गाँव की तरफ लाते थे और मजदूरों को बांट देते थे।
कल्याणदास को लगा कि ऐसे तो पूरे राज दरबार के अन्न भंडार खाली हो जायेगे ,काका ऐसे क्यों कर रहे है। वह गुस्से में ही खण्डेला दुर्ग में पहुँच गया और भोजराज जी से बात ज्यादा बढ़ गयी। तब उसी क्रोध में भोजराज न कल्याणदास को मौत के घाट उतार दिया।
तभी तो कहा गया है-
"भोज भगर के कारणे ,मारयो भँवर कल्याण।"

अब कल्याणदास के बाकी भाई अपने काका भोजराज से बदला लेने पर उतारू हो गए। अपने बाकी सभी पुत्रो को लाडखान ने समझाया और शांत किया लेकिन जब नही माने तो  बोले- "अगर कल्याण तुम्हारा भाई था तो अब भोजराज भी तो मेरा भाई है। मैं अपना जीवन देकर भी भोजराज की रक्षा करूँगा।"
कल्याण ने अपने पितामह की आज्ञा की अवहेलना की तो उसे उसका नाम दण्ड मिल गया।पिता के ऐसे वचनों  ने बाकी भाइयों के क्रोध को शांत कर दिया और वे सभी लाडखान की आज्ञा का उल्लंघन नह कर सके।

लाडखान जी घाटवा के अलावा लोहागर्ल भी रहा करते थे जहां उन्होंने प्रतिहार कालीन वराह मन्दिर जीर्णोद्धार करवाया व गोपीनाथ जी अनन्य भक्त थे। अपने अंतिम समय मे वे वृन्दावन चले गए और वही उनकी इहलीला समाप्त हुई।
उनके पुत्र 11 थे जिनमें 5 निसन्तान थे बाकी 6 के वंशज आज भी लाडखानी कहलाते है
1.सुन्दरदास जी
2 आसकरण जी
3 जगरूप जी
4 केशरी सिंह जी
5 हरिसिंह जी
6 माधोदास जी
 और ठाकुरवास, सुदरासन, बरड़वा, भीमोद, दयालपुरा, नीमास, खूड़ी, चाचिवाद, लामयां, रोलाना, लुनियावास, दौलतपुरा आदि गाँवो में निवास करते है।
खाचरियावास इनका प्रमुख ठिकाना निकल जहाँ सम्मानीय "भैरुं सिंह जी शेखावत" भारत देश के उप-राष्ट्रपति हुए वो भी एक लाडखानी शेखावत थे
#क्रमशः-।

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