बुधवार, 15 अप्रैल 2026

जीवन के जाल

जीवन के जाल





कुछ समझ न आता इसे क्या कहूं,
जीवन का जाल कहूं या कहूं जंजाल।।
करता हूं मैं कुछ, और कुछ ही हो जाता है,
बस फिर क्या,उसको समेटते दिन ढल जाता है।।

यूं तो सबकी जिंदगी में है आफत 
पर मुझ सा कहीं तूफान नहीं।
मानो बैठा हूँ गर डाली पर तो,
डाली में भी जान नहीं।।

रोज रात को सोता हुं ,कल के नए वादे लिए।
पर हुआ सवेरा तो,सब चौपट हो जाता है।।

फिर वही भाग दौड़ में शामिल,
सपने कहीं छूट जाते है।
इन्हीं सपनों को पूरा करते करते,
फिर अपने पीछे छूट जाते है।।

तभी पीछे से एक आहट सुनाई देती है,
कहती हैं दिया था तुझे एक कोरा पन्ना।
अपने साझ बना ले ढंग से 
लेकिन इस जीवन के जाल में फंसते फंसते 
न साझ बचा न वो कोरा पन्ना।।

जवानी के ख़ाब देकर , बचपन ने लूट लिया,
दौलत का खाब देकर, जवानी ने लूट लिया।
कुछ बचा है तो सिर्फ मैं,इस सूनेपन में,
इसको अब तेरी , यादों ने लूट लिया।।

                     
                              -लम्हें




मंगलवार, 18 जून 2024

यादें है साहब

यादें है साहब, यूँ ही नही मिटती




वैष्णों देवी की यात्रा वाली थकान कहाँ है

बिहारी जी का वो, किराये का मकान कहाँ है

जन्मदिन का वो पहला केक कहाँ है

और उसकी नई लिपिस्टिक का वो शेड कहाँ है



tuv  की लोंग ड्राइव का वो स्वाद कहाँ है।

अजंता के बुद्ध और एलोरा के वो शिव कहाँ है।

यादें है साहब , ये कोई मजाक नही जो मिट जाए,

पहले प्यार का वो ,अब एहसास कहाँ है।


काली जुल्फों का घना अंधेरा अब कहाँ है ।

तेरे बनाये उस ,खाने का अब स्वाद कहाँ है ।

बनारस के लौंगलते की मिठास,अब कहाँ है।

ट्रेन मे निकले वो १२ घंटे का साथ, अब कहाँ है।


हांशु को डाटने वाला ,वो गुस्सा अब कहाँ है।

पैसे खत्म होने पर,वो माँगने का साहस कहाँ है।

ये यादे है साब, गीली स्याही नही,जो मिट जाए

भाग-दौड़ भरी जिंदगी मे भूल जाऊ,वो बात कहाँ है।


टिफिन मे डाली गयी बड़ी चपाती और साग कहाँ है।

तेरे साथ बिताये पल और सावन की बरसात कहाँ है।

ये यादें है साब, समंदर की रेत पर लिखा नाम नही,

जो लहरें आये और मीटा  जाए।



  - इंजीनियर की कलम से-







लोकप्रिय पोस्ट

ग्यारवीं का इश्क़

Pic- fb ग्यारवीं के इश्क़ की क्या कहूँ,  लाजवाब था वो भी जमाना, इसके बादशाह थे हम लेकिन, रानी का दिल था शायद अनजाना। सुबह आते थे क्लासरूम में...

पिछले पोस्ट