मंगलवार, 18 जून 2019

बेइंतेहा

                                बेइंतेहा

             (प्रकाशित- काव्य प्रभा, सांझा काव्य संग्रह)



इश्क़ मेरा मुकम्मल हो ना हो
पर याद तो तुझे आज भी करते हैं,
तुम भले ही गौर करो ना करो,
प्यार तो तुम्हें आज भी करते हैं।


भले ना हो अब तुम पास में,
तो क्या हुआ
पर तुम्हारा स्पर्श तो हम आज भी,
महसूस करते हैं।


प्यार से हो या गुस्से में हो,
तुम जब रौब मुझपे जमाती हो,
उस रौबीले चेहरे को तो ,
हम आज भी मिस बहुत करते हैं।


अब तो अकेले रहने में भी
 है मजा कहाँ,
तेरे अटूट साथ को तो हम
 आज भी तरसते है।


तेरी तस्वीरों को सीने से लगा के सोते है,
तेरे पसंदीदा गानों को जो गुनगुनाते है,
कुछ भी कहे जमाना पर
 प्यार तो हम 
तुम्हे आज भी बहुत करते हैं।


तेरा रात को यूं सपनो में आना,

आके हल्का सा सहला जाना ,
ये प्यार नही तो क्या है?

तेरी हर उस अदा का हम बेसब्री
से इंतजार तो आज भी बहुत करते है,
तुम मानो या न मानो,
प्यार तो हम तुम्हे आज भी बेइंतहा करते है।


                                        -आनन्द-





8 टिप्‍पणियां:

Mak Choudhary ने कहा…

Beautiful lines. 👍

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

सुंदर कविता।

आनन्द ने कहा…

धन्यवाद मुकेश जी।

Suresh yadav ने कहा…

Bahut umda

गूँगी गुड़िया ने कहा…

बहुत ही सुन्दर
सादर

Kamini Sinha ने कहा…

बहुत सुंदर रचना ,सादर

आनन्द शेखावत ने कहा…

धन्यवाद,कामिनी जी

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुन्दर कवितायें बार-बार पढने पर मजबूर कर देती हैं. आपकी कवितायें उन्ही सुन्दर कविताओं में हैं.

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