सोमवार, 1 जुलाई 2019

सूरत अग्नि कांड-एक प्रतिक्रिया

आँखों के तारे

    {विशेष- ब्लॉग बुलेटिन सम्मान रत्न-2019 में नॉमिनेटेड}

                   Pic- सूरत कोचिंग सेन्टर भवन
                             Pic- google

रोज की तरह आज की सुबह भी बड़ी निराली थी,
अब तो सूरज ने भी करवट बदल डाली थी,
और हमेशा की तरह उनकी भी यही तैयारी थी,
कि अगले ही कुछ सालों में जिन्दगी बदलने की बारी थी।

दिलों में जोश और अथक जुनून उनमे भरा पड़ा था,
और अगले ही पल उनमें से हर कोई कोचिंग में खड़ा था,
उस अनभिज्ञ बाल मन को क्या पता था,
कि अगले ही पल तूफान भी उनके द्वार पर खड़ा था ।

लेकिन जैसे-तैसे क्लास की हो गयी तैयारी थी,
उन्हें क्या पता उनकी किस्मत यहाँ आके हारी थी,
वो तो बस धुन के पक्के लगे थे भविष्य बनाने मे,
उनका भी तो लक्ष्य था हर सीढ़ी पर आगे आने में।

जैसे ही मिली सूचना,उस अनहोनी के होने की,
मच गया था कोहराम,पूरे भवन और जीने में,
ना कोई फरिश्ता था आगे,अब उनको बचाने में,
लेकिन फिर जद्दोजहद थी,उनकी जान बचाने में।

कॉपी पेन और भविष्य,अब पीछे छूट चुके थे,
सब लोगों के पैर फूल गये औऱ पसीने छूट चुके थे,
अब तो बस एक ही ख्याल,दिल और दिमागों में था,
विश्वास अब  बन चुका था,जो खग औऱ विहगों में था।

यही सोचकर सबने ऊपर से छलांग लगा दी थी,
लेकिन प्रशासन की तैयारी में बड़ी खराबी थीं,
न कोई तन्त्र अब तैयार था नोजवानों को बचाने में,
अब तो बस खुद की कोशिश थी बच जाने में।

पूरी भीड़ में बस,वो ही एक माँ का लाल निराला था,
जो आठ जानें बचा के भी,न रूकने वाला था,
वो सिँह स्वरूप केतन ही, मानो बच्चों का रखवाला था,
रक्त रंजित शर्ट थीं उसकी, जैसे वही सबका चाहने वाला था।

बाकी खड़ी भीड़ की,आत्मा मानो मर चुकी थी,
उनको देख के तो मानो,धरती माँ भी अब रो चुकी थीं,
कुछ निहायती तो बस वीडियो बना रहे थे,
और एक-एक करके सारे बच्चे नीचे गिरे जा रहे थे।

फिर भी उनमें से किसी की मानवता ने ना धिक्कारा था,
गिरने वाला एक - एक बच्चा अब घायल और बिचारा था,
कुछ हो गए घायल और कुछ ने जान गँवाई थी,
ऐसे निर्भयी बच्चों पर तो भारत माँ भी गर्व से भर आयी थी।

लेकिन फिर भी न बच पाए थे वो लाल,
और प्रशासन भी ना कर पाया वहाँ कोई कमाल,
उज्ज्वल भविष्य के सपने संजोये वो अब चले गए,
कल को बेहतर करने की कोशिश में आज ही अस्त हो गए।

उन मात- पिता के दिल पर अब क्या गुजरी होगी,
उनकी ममता भी अब फुट- फूटकर रोई होगी,
क्या गारंटी है किसी और के साथ आगे न होगा ऐसा,
इसलिए प्रण करो कि सुधारे व्यवस्था के इस ढांचे को,
ताकि न हो आहत कोई आगे किसी के खोने को,

क्योंकि जो गए वो भी किसी की आँखों के तारे थे,
किसी को तो वो भी जान से ज्यादा कहीं प्यारे थे।

-टिप्पणी-

धन्यवाद ज्ञापित करना चाहूंगा श्री केतन जोरवाड़िया जी का जिन्होंने ने जान पर खेल कर कुल आठ जानें बचाई,और निवेदन करना चाहूंगा समस्त मानव जाति से कि ऐसा कहीं होते हुए देखे तो मानव सेवा में योगदान दें न कि खड़े- खड़े वीडियो बनाएं।

         -सभी स्वर्गीय बच्चों को भावभिनी श्रद्धाजंली।

                                               लेखन- आनन्द



मंगलवार, 18 जून 2019

बेइंतेहा

                                बेइंतेहा

             (प्रकाशित- काव्य प्रभा, सांझा काव्य संग्रह)



इश्क़ मेरा मुकम्मल हो ना हो
पर याद तो तुझे आज भी करते हैं,
तुम भले ही गौर करो ना करो,
प्यार तो तुम्हें आज भी करते हैं।


भले ना हो अब तुम पास में,
तो क्या हुआ
पर तुम्हारा स्पर्श तो हम आज भी,
महसूस करते हैं।


प्यार से हो या गुस्से में हो,
तुम जब रौब मुझपे जमाती हो,
उस रौबीले चेहरे को तो ,
हम आज भी मिस बहुत करते हैं।


अब तो अकेले रहने में भी
 है मजा कहाँ,
तेरे अटूट साथ को तो हम
 आज भी तरसते है।


तेरी तस्वीरों को सीने से लगा के सोते है,
तेरे पसंदीदा गानों को जो गुनगुनाते है,
कुछ भी कहे जमाना पर
 प्यार तो हम 
तुम्हे आज भी बहुत करते हैं।


तेरा रात को यूं सपनो में आना,

आके हल्का सा सहला जाना ,
ये प्यार नही तो क्या है?

तेरी हर उस अदा का हम बेसब्री
से इंतजार तो आज भी बहुत करते है,
तुम मानो या न मानो,
प्यार तो हम तुम्हे आज भी बेइंतहा करते है।


                                        -आनन्द-





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