बुधवार, 17 जून 2026

मायड़ भाषा

परदेसी बाबू



दोन्यू बढ़गर मोकळा, बंध्या परदेशा  म ठेठ।
भाण- भाया को जमावड़ों, म्हाने बणाया सेठ।।

संग म काको अर मात है, काली कोशा हाट।
जे मैं आगो गांव न, धंधों हूजा बारा बाट।।

आगे सावण मोकळो, मिलस्यां सारा साथ।
अबके तो थे दयों माफी, जोड़या दोनू हाथ।।

दादी बूढ़ी हो री घणी, सेवा मांगे दिन -रात।
ओजू आस्युँ मिलवा न, जे ऊपरला को रेसी साथ।।

 मैं तो मेरा चाव स्यु, आयो नहीं परदेश।
या पेट की लाय अनोखड़ी, छुड़ा दियो स्वदेश।।

-परदेसी आनन्द

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