जीवन के जाल
कुछ समझ न आता इसे क्या कहूं,
जीवन का जाल कहूं या कहूं जंजाल।।
करता हूं मैं कुछ, और कुछ ही हो जाता है,
बस फिर क्या,उसको समेटते दिन ढल जाता है।।
यूं तो सबकी जिंदगी में है आफत
पर मुझ सा कहीं तूफान नहीं।
मानो बैठा हूँ गर डाली पर तो,
डाली में भी जान नहीं।।
रोज रात को सोता हुं ,कल के नए वादे लिए।
पर हुआ सवेरा तो,सब चौपट हो जाता है।।
फिर वही भाग दौड़ में शामिल,
सपने कहीं छूट जाते है।
इन्हीं सपनों को पूरा करते करते,
फिर अपने पीछे छूट जाते है।।
तभी पीछे से एक आहट सुनाई देती है,
कहती हैं दिया था तुझे एक कोरा पन्ना।
अपने साझ बना ले ढंग से
लेकिन इस जीवन के जाल में फंसते फंसते
न साझ बचा न वो कोरा पन्ना।।
जवानी के ख़ाब देकर , बचपन ने लूट लिया,
दौलत का खाब देकर, जवानी ने लूट लिया।
कुछ बचा है तो सिर्फ मैं,इस सूनेपन में,
इसको अब तेरी , यादों ने लूट लिया।।
-लम्हें
