शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

प्रेरणा- एक अनोखी कहानी

                   प्रेरणा-एक अनोखी कहानी

                                     

Pic-साभार गूगल

कहते हैं कि अगर किसी को आगे बढ़ना हो और वो किस्मत का इन्तजार किये बिना हाड़तोड़ मेहनत करे तो ऊपरवाले को भी उसे नजरअंदाज करने हक नही होता और वह सब कुछ देना पड़ता है जो उसने चाह रखी हो।
रचित अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी करके शहर के किसी पॉलीटेक्निक कॉलेज में दाखिला ले लिया था और पढ़ने में इतना होशियार कि पिछला विद्यालयी पाठ्यक्रम उसने अव्वल दर्जे से पास किया था।
इसी दरमियान रचित के पिताजी का स्वर्गवास हो गया और रचित पर समस्याओं का पहाड़ ही टूट पड़ा।अब उसकी कोई चाह नही रही थी आगे पढ़ने की। सारी जिम्मेदारियां मानो उसी का मुंह बाएं राह देख रही हो और ऊपर से घर खर्च, छोटी बहन की पढ़ाई भी तो उसे ही अब देखना था।
अतः वह निराश होकर जैसे-तैसे अपने होस्टल की ओर बढ़ रहा था और बहुत दिनों बाद वह होस्टल पहुँचा। सारे मित्र उससे मिलने आये लेकिन सब के सब भी आखिर करे तो क्या करे। रचित को कुछ नही सूझ रहा था और उसके मित्र भी इसे हल करने में नाकामयाब से थे कि रचित की पढ़ाई कैसे आगे बढ़े।
रचित की एक क्लासमेट प्रेरणा थी जो उससे अगले दिन क्लास के वक्त मिली, जब रचित मायूस सा अपनी किताबें समेटकर निकलने की तैयारी में था। उसी वक्त प्रेरणा ने उसे आवाज दी और इशारा करके अपनी ओर बुलाया। रचित आवाज सुनकर सकपका गया क्योंकि पहले कभी किसी लड़की ने उसे ऐसे नही पुकारा था। वह सहमा सा उसके पास गया और दोनों कैंटीन की तरफ चल पड़े।
दोनों ने बाते की और नतीजा अभी कुछ नही था लेकिन समस्या अब प्रेरणा को भी हो गयी थी क्योंकि उसका खुद का संघर्ष कुछ निराला था, वह भी तो आखिर स्कॉलरशिप से पढ़ाई कर रही थी। लेकिन कहते है ना कि जिसके कोहनी के हाड़ को लगी हो, वही उसका असली दर्द जानता है। ऐसा ही कुछ अब प्रेरणा के साथ चल रहा था।
प्रेरणा बहुत ही सरल स्वभाव की लड़की थी और उतनी ही बेबाक और निडर भी। उसके भी जिंदगी में आगे पीछे कोई नही था। माँ बाप का पता नही और वह तो हमेशा अनाथ आश्रम की प्राचार्या को ही माँ समझती थी और उसी को अपना घर भी।
लेकिन अगले ही दिन जब वह कॉलेज आयी तो आते ही उसने रचित को ढूंढना शुरू किया और जब रचित को लाइब्रेरी में पाया तो बिल्कुल उछल पड़ी। और बोली रचित अब तुम्हे उदास होने की कोई जरूरत नही है, मेरे पास तुम्हारे लिए एक आईडिया है।
रचित कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसने सारा मास्टर प्लान टेबल पर डाल दिया।उसने रचित को बताया कि उसके आश्रम में कोई बैंक मैनेजर हमेशा कुछ न कुछ बच्चों को बांटने के लिए आते रहते है और उसने रचित की समस्या मैनेजर साब को बताई।
अब बैंक में मैनेजर साब से मिलने की बारी रचित की थी और अगले ही दिन रचित और प्रेरणा बैंक की ब्रांच में मैनेजर साब का इंतजार कर रहे थे। जैसे ही साब आये ,रचित ने प्रणाम किया और दोनों आफिस के अंदर। फिर साब ने रचित की जिज्ञासाओं को भांप कर कुछ देर सोचने के बाद बोले।
रचित तुम्हारा कॉलेज टाइमिंग क्या है।
इतने में तपाक से प्रेरणा बोल पड़ी- सुबह 7 से 12
मैनेजर साब प्रेरणा के उत्साह को देखते हुए मुस्कुरा कर बोले- रचित, मानो अब तुम्हारी प्रॉब्लम का सोलुशन मिल गया।
तुम कॉलेज के बाद 2 बजे से 10 बजे तक मेरे पास आ सकते हो, मेरे पास तुम्हारे लिए एक काम है, जिससे तुम्हारी कॉलेज भी पूरी हो जाएगी और घर की भी चिंता खत्म। तुम्हे 2 बजे से बैंक एटीएम का गॉर्ड बनने में कोई समस्या तो नही?
रचित को भी हाँ बोलते हुए एक सेकंड न लगी और नोकरी फिक्स हो चुकी थी।
अगले ही दिन से रचित की दिनचर्या बदल चुकी थी, और सुबह 5 बजे जगा, हाथ मुँह धोकर, टहलने निकल पड़ा और मन ही मन प्रेरणा का शुक्रिया कैसे अदा करे , यह सोचता हुआ आगे बढ़ रहा था।
फिर वह तैयार होकर कॉलेज गया और रोजमर्रा की तरह जैसे उसके साथ कुछ हुआ ही न हो, वह बिंदास लेक्चर अटेंड कर रहा था, जैसे उसे कुछ प्रॉब्लम ही नही हो।
अब 12 बजे वह होस्टल जाकर खाना खाया और पहुँच गया बैंक की शाखा में। अब तो यह उसकी रोजाना की दिनचर्या में जुड़ गया था। और रात को 10 बजे वापस अपनी साईकल से होस्टल जब तक कि दूसरा गॉर्ड वहाँ नही आ जाता। ऐसे में होस्टल मेस स्टाफ भी रचित का बड़ा ही सहायक साबित हुआ। उसका खाना पैक करके रख दिया जाता और जैसे ही रचित आता, हाथ मुँह धोकर खाना खा लेता।
हाँ, कुछ समस्या तो उसे फिर भी होती थी, लेकिन वह काफी सूझबूझ वाला लड़का था ,जब भी बैंक जाता तो अपने काम की बुक्स और पढ़ने की सामग्री साथ ले जाता और बड़ी आराम से वातानुकूलित केबिन में तसल्ली से पढ़ता। यह कहना भी कोई अतिशयोक्ति नही है कि जब आप किसी काम को सिद्दत से करते है तो ये कायनात भी आपकी सहायक साबित होती है और ऐसा ही रचित के साथ भी हुआ।
ऐसे करते -करते कब दिन बीत गए और पता भी नही चला और एक महीना पूरा हो चुका था । और जिस लग्न से उसने गॉर्ड की ड्यूटी की ,उसी लग्न और उत्साह से मैनेजर साब ने रचित के हाथ मे 6000 का चैक रख दिया और अब तो रचित भी बैंक के बाकी कर्मचारियों का चहेता बन गया था। उसका भी अब एक खाता बैंक में खुल चुका था और या यूं कह लीजिए वह भी बैंक का एक कर्मचारी बन चुका था।
सभी उसे बहुत पसंद भी करने लगे थे क्योंकि उनकी भी रचित हेल्प कर दिया करता था कभी-कभी। अब रचित कोई समस्या नही थी क्योंकि फीस उसकी प्रिंसिपल साब ने माफ कर दी और खाना- रहना होस्टल में था ही। अब जो कुछ बैंक से मिलता वो सब वह घर भेज देता। इससे घर पर भी सब कुछ ठीक चल रहा था और मां का मन भी अब हल्का था क्योंकि छुटकी की भी पढ़ाई गाँव के सरकारी स्कूल में सही चल रही थी।
ऐसे करते -करते कब सेशन खत्म हो गया और रचित और प्रेरणा दोनों कॉलेज से इंजीनियरिंग का डिप्लोमा पूरा कर चुके थे और दोनों का प्लेसमेंट अच्छी कंपनी में हो चुका था और किस्मत की बात यह है कि दोनों अभी भी एक साथ, एक आफिस में काम कर रहे है।
जब भी रचित घर आता तो अब प्रेरणा को घर ले आता था और उसे भी अब रचित की बहन और माँ ,अपना परिवार जैसा लगने लगा था। लेकिन समाज मे ऐसे रिश्ते को हेय दृष्टि से देखा जाता है यह उनको कहाँ पता था ।
लेकिन इस दीवाली रचित की बहन ने एक दम से कह ही दिया था कि - भैया, आप दोनों शादी क्यों नही कर लेते?
और मानो दोनो के चेहरों की हवाइयां उड़ गई थीं सुनते ही।
रचित एकाएक बोल उठा- माँ, ये मेरी अच्छी दोस्त है। ऐसे कैसे हो सकता है।
पर माँ ने बिना वक्त गवाएं, प्रेरणा से ही पूछ लिया- क्या तुम्हें रचित अच्छा लगता है। बस फिर क्या था, प्रेरणा के पास इसका कोई जवाब ही नही था और इसी में उसकी हाँ थी।
इतने में माँ ने रचित को बोला कि- इसे परिवार मिल जाएगा और हमे बहू, क्यों प्रेरणा ?
प्रेरणा शर्म से बस सर झुकाए बैठी थी, अब मांजी को बोले तो भी क्या ? क्योंकि प्रेरणा भी तो शायद मन ही मन यही चाहती थी।
पर जब माँ ने दोनों को समझाया तो दोनों मान गए क्योंकि कितने दिन ऐसे सब चलता और प्रेरणा का तो कोई घर और परिवार भी नही था।
अंततः दोनों ने शादी कर ली और लड़की वालों की तरफ से कन्यादान करने का मौका मिला- बैंक मैनेजर साब को।
यूँ तो मैनेजर साब को एक लड़की है पर अब दो हो चुकी थी।
और पूरे घर और गाँव मे अब खुशी का माहौल था और हो भी क्यों न, आखिर दो इंजीनियर जो शादी कर रहे थे।
और साथ ही आश्रम की प्राचार्या की खुशी का भी कोई ठिकाना नही था, उनकी एक छात्रा जो अब एक जीवन की नई पारी की शुरुआत जो करने जा रही थी। जिससे अन्य बच्चों को भी जीवन मे आगे बढ़ने की प्रेरणा जो मिल रही थी।
प्रेरणा का जैसा नाम था वह तो अब रचित के लिए प्रेरणा बन चुकी थी और दोनों एक साथ माँ और छुटकी के साथ शहर में रह रहे थे और अब तो कंपनी से उन्हें घर भी मिल चुका था । अब चारों की एक बहुत ही संजीदा जिंदगी चल रही थी और छुटकी का दाखिला भी अब उसी शहर के कॉलेज में जो करवा दिया था।
हाँ, लेकिन प्रेरणा की एक आदत आज भी खास है जो रचित को अच्छी भी लगती है और वो ये है कि - अपना जन्मदिन तो वह आज भी उसी अनाथ आश्रम के बच्चों के साथ मनाती है। उनके लिए बहुत सारे तोहफे लेकर जाती है और प्राचार्या के लिए कुछ पैसे भी ,जिनसे आश्रम की कुछ रोजमर्रा की चीज़ें लायी जा सके। और प्रेरणा का आश्रम अब प्रेरणा का मायका भी था जिसमे वह जैसे ही समय मिलता तो वही बीता के आती थी।
प्रेरणा अब रचित के साथ - साथ आश्रम के बच्चों की भी प्रेरणा बन चुकी थी। इसलिए कहते है कि- अगर आप मानवता को कुछ अच्छा देने का प्रयास करते है तो वही से यह दुगुना होकर वापस मिलता है। इसलिए किसी की सहायता करने में कभी पीछे नही हटना चाहिए, जैसा प्रेरणा ने किया और उसे मिला भी।


                         -आनन्द

   
       


6 टिप्‍पणियां:

Suresh yadav ने कहा…

Nice line

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (०९ -११ -२०१९ ) को "आज सुखद संयोग" (चर्चा अंक-३५१४) पर भी होगी।

चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
-अनीता सैनी

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

बढ़िया कहानी ...... लिखते रहें

Unknown ने कहा…

Aapka shukriya kis prakar kare hmare pas shabd hi nhi rhe khne ko kuch duniya se nirala h aapka andaj ......
Bhut achchhe

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

मार्मिक एवं प्रेरक कहानी.

Tek Chand verma ने कहा…

Nice


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